Friday, July 3, 2015

"गंगा कहीं गन्दा नाला न बन जाये.. "

"गंगा कहीं गन्दा नाला न बन जाये.. " - ये वाक्य अक्सर आपको आजकल किसी भी न्यूज़ चैनल में कहते मिलजायगा। सच बात तो यह है कि गंगा जैसी पवित्र नदी अब गन्दा नाला बन चूका है, ये वो गंगा नही रही जिसका नाम सुनते ही हमारे मस्तिस्क में सीसे जैसी चमकते और सीतल जल की छवि बन जाया करती थी। और यह गन्दा नाला आज नही, सालों पहले बन चुकी है , ये बात और है हमे आज नजर आया होगा या यूँ कहिये हम देख कर भी इसे अनदेखा कर देते हैं । सायद यह कहकर की हमारे निजी जिंदगी में इतनी मुश्किले है तो हम गंगा को अकेले क्या साफ़ कर सकेंगे? और जो लोग सत्ता में बैठे है, जो वाकय कुछ कर सकते हैं, उनके पास नोट बनाने से फुर्सत कहाँ की आसपास कुछ नजर भी आये।

एक मूवी में बड़ा खूबसूरत डायलॉग है - "अगर आपके पांच लाख का  कार कोई गन्दा करदे या नुकसान करदे तो आपको कितना गुस्सा आता है, तो जरा सोचिये प्रकृति को कैसा लगता होगा जब हम उनके इस खूबसूरत दुनिया को नस्ट करते हैं . . ", ये मूवी की बात है लोग देखते है और अपनी दुनिया में वापस लौट जाते हैं।  किसी को इतनी फुर्सत कहाँ की इन बातों को याद रखे या अमल करे उस पर । चलिए हम भी वापस चलते है अपने हैं अपनी बातों में … ।


गंगा इतना प्रदूशित क्यों है?
इसका जिम्मेदार भी हम हैं और हमरा यह समाज । सरकार पूरी तरह से जिम्मेदार है, ये कहना ठीक नही रहेगा । हम इसलिए जिम्मेदार हैँ क्यूंकि मानव ही है जो सबसे अधिक कूड़ा कचरा नदी में बहता है और इस कूड़े में सिर्फ कूड़ा ही नही होता बहुत कुछ होता है।  आप समझदार हैं , समझ गए होंगे क्या कहना चाह रहा हूँ। मानव सबसे निम्न वर्ग में हैं किंतु अधिक तादाद में  हैं , जो गंगा जी  को निरंतर गन्दा कर रही हैं ।

इसके ठीक ऊपर वर्ग में है - फैक्टरी, जिसका सारा गन्दा पानी, तेल, ग्रीज़. .. नदी में ऐसे बहाया जाता है मनो  ये उसके बाप का धरोहर है ।  यह केमिकल इतना गाड़ा और खतरनाक होता है की सदियों तक में भी रीसायकल  नही हो पता है , नतीजा है जल प्रदुषण । यह एक एटम बम की तरह है जिसकी प्रक्रिया धीमी मगर असरदार होती है , और जो पुरे प्रकृति तथा इनसे जुडी हर चीज नस्ट कर देती है ।

और सबसे ऊपर बैठे है प्रकृति के ठेकेदार, जो पैसा लेकर कुछ भी कर सकते है। उससे इस बात की कतई  फिक्र नही होती है की  वो जिस सिस्टम को पास  कर रहा है उसका आनेवाले समय में क्या परिणाम हो सकता है । होगा भी कैसे, नोटों की गर्मी और घूस  की चर्बी तो आदमी का आँख और मस्तिस्क दोनों काम करने से बंद करदेता है ।

ऊपर वाले ने बहुत सुन्दर प्रकृति बनाया, सब कुछ एकदम बैलेंस्ड । लेकिन उसने आदमी बनाकर भूल की , और सबसे बड़ी भूल की उसमे दिमाग दे कर । अगर उसने कहीं भी कंजूसी दिखाया होतआदमी बनाते समय तो सायद  आज उनका प्रकृति में बनाया कोई चीज नस्ट नही होता ।