Tuesday, December 31, 2013

क्या श्री राम चंद्रा और लक्षमन जी वाक्यी बुधीमान थे?

यह सवाल रह-रह कर मेरे मान मे हिचकोले ख़ाता है, क्या श्री राम चंद्रा और श्री लक्षमन जी ज्ञानी और बुधीमान थे? जब सुर्पणखा अपनी शादी की प्रस्ताव लेकर उनके पास आए तो राम जी ने मना कर दिया, स्वभाविक था चूँकि उनकी पत्नी उनके साथ थी! यही प्रस्ताव लक्षमन जी के साथ भी रखा गया, लेकिन उन्होने भी बेदर्दी से ठुकरा दिया !  ना उनकी पत्नी साथ थी और ना ही वो श्री राम चंद्रा के जैसे सत्यवादी थे, फिर ऐसा क्यूँ? लोग कहते थे सुर्पणखा विश्वसुन्दरी से कम नही थी, और चूँकि उनका भाई लंकापति नरेश थे तो धनवान भी रही होगी! फिर इतनी बड़ी प्रस्ताव लक्षमन जी ने क्यू ठुकराया? गर वो अपने बड़े भाई राम चंद्रजी के नक्शे-कदम पर चलना चाहते थे, फिर तो उन्हे सुर्पणखा की नाक नही काटनी चाहिए थी, क्यूंकी यह नारीजाति को अपमानित करना है जो की राम जी के जमीर की बात नही थी! अब रही बात दूसरी पत्नी की तो लक्षमन जी स्वंय की तीन माताएँ थी, फिर ये तो उनके लिए कोई नयी बात नही होती!

अवसर हरेक को दस्तक देता है! कौन उसे कितना समझता है और अपनाता है, यह उनके स्वयं की बात है!
यहाँ गर लक्षमनजी ने सुर्पणखा को अपमानित नही किया होता और उनके प्रस्ताव को क़ुबूल कर लिया होता तो वह पूरे भारतवर्ष का ही नही बल्कि लंका का भी नरेश होता! यही नही, उनकी भाभी की भी अपहर्न नही होता और ना ही अग्नि परीक्षा देनी पड़ती! उन्हे अग्नि परीक्षा के बाद भी, जंगल के कुटिया मे अपना जीवन व्यतीत करना पड़ा, सायद यह भी नही करना पड़ता! अब आप कहिए, क्या वाक्यी मे वे दोनो ज्ञानी और समझदार थे?

था तो प्रस्ताव एक, जिसके कुबूलने पर फ़ायदे थे अनेक! लेकिन इसके विपरीत, इसे ठुकराने का फल पूरी रामायण खुद बयान कर रही हैं! आज के दौर मे इसे ही कहते है- राजनीति! सयद इसीलिए कहते है कि अवसर एक बार दस्तक देता है, दुबारा नही मिलता है! मिलता है तो बस जीवन से समझौता!